प्राकृतिक दूध और कृत्रिम दूध

लेखक परिचय

  • लेखक का नाम: डॉ. स्नेहा जीवन शेंडे
  • पाठ्यक्रम: सहायक प्राध्यापक
  • महाविद्यालय: दुग्ध तंत्रज्ञान महाविद्यालय, वरुड (पुसद), महाराष्ट्र पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय (MAFSU), नागपूर, महाराष्ट्र, भारत
  • लेख आईडी: APH-V01-I05-02
  • लेखक का ईमेल:  snehashende@mafsu.ac.in
  • सह-लेखकों के नाम: डॉ. माधव पाटील, डॉ. प्रसाद पाटील, डॉ. गजानन नारनवरे

लेख का शीर्षक: प्राकृतिक दूध और कृत्रिम दूध: अंतर, पोषण एवं स्वास्थ्य पर प्रभाव

सारांश

दूध हमारे दैनिक आहार का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसे संपूर्ण आहार के निकट माना जाता है, क्योंकि इसमें उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, वसा, लैक्टोज, कैल्शियम, फॉस्फोरस तथा विभिन्न विटामिन पाए जाते हैं। बच्चों की वृद्धि, हड्डियों और दाँतों के विकास तथा वयस्कों के पोषण में दूध की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। भारत में दूध केवल पोषण का स्रोत ही नहीं, बल्कि लाखों किसानों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार भी है।

बढ़ती जनसंख्या और दूध की बढ़ती माँग के कारण बाजार में दूध की शुद्धता एवं गुणवत्ता का प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो गया है। कभी-कभी दूध में पानी, स्टार्च, डिटर्जेंट, यूरिया या अन्य अवांछित पदार्थ मिलाने जैसी मिलावट की घटनाएँ सामने आती हैं। इसके अतिरिक्त, खाद्य उद्योग में पौधों से प्राप्त सामग्री के आधार पर दूध जैसे पेय भी बनाए जाते हैं। इसलिए प्राकृतिक दूध, मिलावटी दूध और पौध-आधारित दूध के बीच अंतर समझना आवश्यक है।

अपने मित्रों के साथ साझा करें

Facebook
Twitter
LinkedIn
WhatsApp
Threads